|| प्रेम || मुझे वो शब्द ही नही मिलते जिन्हें तेरे लिए पिरों सकूँ क्या इतना काफी न होगा की इसे सिर्फ “प्रेम” कह सकूँ देखा है मैंने शब्दों के जाल में भावनाओं को उलझते हुए क्या मैं तुम हो, तुम मैं हूँ ये ‘प्रेम’नहीं लोग कहते हैं ये शब्द जादुई है सरलता में मैंने बस इतना जाना अगर तुम्हारे बिना मैं अधूरी तो तुम होगे पुरे कैसे क्या यही प्रेम है बिन कुछ कहे ही सारी बातें समझ जाना बिन कुछ पाए ही सब कुछ पा लेने की ख़ुशी नर्म स्पर्श से मजबूती और भरोसे का एहसास आँखों की चमक में गगन को छूने का एहसास हाँ, हाँ शायद यही प्रेम है…